का आजु-काल्ह के पुरस्कार-आधारित शिक्षा भ्रष्टाचार के मानसिक जड़ हऽ?
गुरुकुल से किंडरगार्टन तक: शिक्षा, संस्कार आ भ्रष्टाचार पर एगो वैचारिक विमर्श
— एगो मौलिक विचार आ शोध-परिकल्पना
लेखक: G. D. Pandey
भ्रष्टाचार पर बरिसन से बहस होत आवत बा। एकरा कारन में गरीबी, लालच, कमजोर कानून, राजनीतिक दखलंदाजी, प्रशासनिक ढिलाई, सामाजिक गैर-बराबरी आ नैतिक पतन नियर कयन गो कारन गिनावल जाला। बाकिर हमार मानल बा कि एह सभके पाछे एगो अइसनो कारन हो सकेला, जेकरा पर जेतना गंभीरता से विचार होखे के चाहीं, ओतना ना भइल बा—शुरुआती शिक्षा प्रणाली।
ई लेख कौनो साबित भइल नतीजा के दावा ना करेला। ई एगो मौलिक वैचारिक परिकल्पना (Hypothesis) हऽ, जेकरा के हम शिक्षा-शास्त्री, मनोवैज्ञानिक, समाजशास्त्री, दार्शनिक आ नीति-निर्माता लोगन के विचार खातिर सोझा रखत बानी।
गुरुकुल के शिक्षा: पहिले करम, बाद में इनाम
भारतीय गुरुकुल परंपरा के मूल उद्देश्य खाली पढ़ल-लिखल सिखावल ना रहे। ओकर लच्छन रहे—चरित्र निर्माण, आत्मसंयम, अनुशासन, सेवा, ईमानदारी आ कर्तव्यबोध के विकास कइल।
बिद्यार्थी से ई आस राखल जात रहे कि ऊ पढ़ाई एह से करे काहें से कि गियान ओकर धरम आ कर्तव्य हऽ। अनुशासन टूटे पर सजा मिल सकत रहे, बाकिर शिक्षा के केंद्र में कर्तव्य रहे, कौनो पुरस्कार ना। गुरुकुल ई सीख देवत रहे कि सही काम एह से करा काहें से कि उहे सही बा।
आजु के किंडरगार्टन: पुरस्कार पर टिकल प्रेरणा
आजु के शुरुआती शिक्षा में अक्सर लइकन के बढ़ावा देवे खातिर चॉकलेट, स्टार, स्माइली, स्टिकर, गिफ्ट, टॉफी भा दोसर पुरस्कारन के इस्तेमाल कइल जाला।
जइसे गुरुजी कहेलें—
"A लिखबा तऽ चॉकलेट मिली।"
ई तरीका पढ़ाई-लिखाई के मजेदार बनावे खातिर अपनावल जाला। हम ओकरा उद्देश्य पर उँगली नहीं उठावत बानी। हमार सवाल तऽ ओकरा दूरगामी मनोवैज्ञानिक (मानसिक) असर पर बा।
जदि लइका के दिमाग बार-बार ई सीखत बा कि नीक काम के बदला में कौनो न कौनो इनाम जरूरे मिली, तऽ का ओकरा अचेतन मन में ई बात ना बैठ जाई कि हर काम के कौनो न कौनो निजी फायदा होखे के चाहीं?
हमार शोध-परिकल्पना
यहीं से हमार मौलिक विचार शुरू होला।
जदि बचपन में बार-बार ई मानसिक बनावट बन जाता कि काम आ इनाम के अलगा ना कइल जा सके, तऽ का आगा चल के उहे आदमी ई ना सोचे लगी कि—
"जदि हमरा कौनो फाइल पर दस्तखत करे के बा, तऽ हमरा के भी कुछु मिले के चाहीं।"
साफ-साफ कहि तऽ हम ई ना कहत बानी कि चॉकलेट ही आगे चल के घूस बन जाला। हम ई सवाल उठावत बानी कि का पुरस्कार-आधारित सोच के लगातार आदत आदमी के संस्कार आ मूल्य-निर्माण के प्रभावित कर सकेला? जदि अइसन बा, तऽ भ्रष्टाचार के जड़ खाली प्रशासनिक व्यवस्था में ना, बल्कि शिक्षा आ संस्कारन में भी खोजल जाए के चाहीं।
का भ्रष्टाचार बचपन से शुरू होला?
आमतौर पर हमनी के माननी कि भ्रष्टाचार नौकरी मिलला के बाद शुरू होला। हमार विचार एकरा से अलग बा।
हमार मानल बा कि भ्रष्टाचार के लच्छन भले दफ्तर में लउकेला, बाकिर ओकर मानसिक तइयारी बहुत पहिले शुरू हो जाला। जदि बचपन से आदमी के मन हर काम के बदला में कुछ पावे के उम्मीद करे लागे, तऽ मौका मिलला पर उहे आदत आचरण में आर्थिक रूप भी ले सकेला। ई एगो मनोवैज्ञानिक संभावना बा, जेकरा पर गंभीर रिसर्च होखे के चाहीं।
गुरुकुल आ आधुनिक शिक्षा के तालमेल
हम आजु के शिक्षा के विरोधी नईखीं। न ही हम पुरस्कार के पूरा तरीका से बंद करे के बात कहत बानी।
हमार विचार खाली एतने बा कि शिक्षा के केंद्र पुरस्कार ना, बल्कि चरित्र होखे के चाहीं।
जदि लइका के ई भी सिखावल जाव कि—
कुछ काम खाली कर्तव्य खातिर कइल जाला।
हर नीक काम के इनाम पइसा-कउड़ी ना होला।
ईमानदारी अपने आप में एगो बड़हन मूल्य हऽ।
सेवा आ जिम्मेदारी जिनगी के आधार हऽ।
तऽ ई मुमकिन बा कि आवे वाला समाज अउरी ढेर नैतिक आ साफ-सुथरा बनी।
रिसर्च के जरूरत
हम एह विचार के अंतिम सच के रूप में सोझा नईखीं रखत। हम एकरा के एगो शोध-परिकल्पना (Research Hypothesis) के रूप में रखत बानी।
जदि शिक्षा-मनोविज्ञान, तंत्रिका-विज्ञान (Neuroscience), समाजशास्त्र आ अपराधशास्त्र (Criminology) के जानकार लोग एह बिषय पर लामो समय तक अध्ययन करे, तऽ हो सकेला कि भ्रष्टाचार के मानसिक जड़न के बारे में कयन गो नया तथ्य सोझा आ जाव।
निष्कर्ष
भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ा कानून जरूरी बा, बाकिर खाली कानून काफी नईखे। जदि समाज के सचहूँ भ्रष्टाचार-मुक्त बनावे के बा, तऽ हमनी के ई सवाल पूछे के पड़ी कि हमनी के अपना लइकन के का सिखावत बानी—कर्तव्य या खाली पुरस्कार?
ई मुमकिन बा कि भ्रष्टाचार के लड़ाई अदालत से पहिले इस्कूल के क्लासरूम में जीत्तल या हारल जात होखे।
ई लेख एगो मौलिक वैचारिक परिकल्पना हऽ। एकर मकसद कौनो स्थापित शिक्षा-पद्धति के गलत ठहरावल नईखे, बल्कि शिक्षा, मनोविज्ञान आ नैतिक विकास के आपसी संबंध पर एगो गंभीर बौद्धिक बहस के जगावल बा।
— G. D. Pandey
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