Sunday, October 4, 2026

भगत सिंह: विचार, संघर्ष आ शहादत - एगो अइसन जीवन जे आजो सवाल पूछेला

28 सितंबर — शहीद-ए-आज़म भगत सिंह जयंती

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास खाली लड़ाई, आंदोलन आ राजनीतिक समझौता के इतिहास ना ह। ई ओह अनगिनत नौजवानन के कहानी भी ह, जे अपना जिनगी के सबसे सुंदर आ महत्वपूर्ण समय देश के आजादी खातिर समर्पित कर दिहलन।

ओही नौजवानन में भगत सिंह के स्थान बहुत खास बा।

भगत सिंह के नाम सुनते ही हमरा सभ के सामने एगो जवान चेहरा उभर के आवेला—सिर पर टोपी, चेहरा पर आत्मविश्वास आ आँख में अइसन संकल्प, जे ब्रिटिश साम्राज्य के विशाल सत्ता के सामने झुके से इंकार कर दिहलस।

बाकिर भगत सिंह के खाली एगो साहसी क्रांतिकारी के रूप में देखल उनका व्यक्तित्व के छोट कर देला।

ऊ खाली बम-पिस्तौल के भाषा समझे वाला नौजवान ना रहलें। ऊ गंभीर पाठक, लेखक, पत्रकार, राजनीतिक विचारक आ सामाजिक बदलाव के समर्थक भी रहलें।

जेल में रहला के बावजूद ऊ किताब मँगावत रहलें, नोट बनावत रहलें आ राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र, दर्शन आ समाज से जुड़ल सवाल पर लगातार विचार करत रहलें। भारत सरकार के अभिलेखीय सामग्री में उनका जेल नोटबुक में रूसो, वोल्तेयर, थॉमस पेन, बर्ट्रेंड रसेल, टॉल्स्टॉय, मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन आ ट्रॉट्स्की जइसन अनेक विचारकन के संदर्भ मिलेला।

एह से भगत सिंह के कहानी खाली शहादत के कहानी ना, बल्कि विचार से कर्म आ कर्म से बलिदान तक के यात्रा ह।


जन्म आ पारिवारिक वातावरण

भगत सिंह के जन्म 28 सितंबर 1907 के अविभाजित भारत के पंजाब क्षेत्र के लायलपुर जिला के बंगा गाँव में भइल रहे। आज ई इलाका पाकिस्तान के फैसलाबाद क्षेत्र में बा।

उनकर पिता के नाम किशन सिंह आ माता के नाम विद्यावती रहे।

उनकर परिवार राष्ट्रीय आंदोलन आ देशभक्ति के वातावरण से प्रभावित रहे। एह कारण से देश, आजादी आ अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष जइसन सवाल उनकर बाल मन में बहुत पहिले से जगह बनावे लगल।

उनका खातिर देशभक्ति खाली किताब में पढ़े वाला विषय ना रहे।

ई उनकर परिवार आ सामाजिक वातावरण के हिस्सा रहे।


जलियाँवाला बाग आ बाल मन पर पड़ल प्रभाव

13 अप्रैल 1919 के जलियाँवाला बाग हत्याकांड भारतीय इतिहास के ओह घटनन में से एगो ह, जे ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीय जनता के भावना के गहराई से प्रभावित कइलस।

ओ समय भगत सिंह बहुत छोट रहलें, बाकिर पंजाब के राजनीतिक वातावरण उनकर सोच पर गहरा प्रभाव डालत रहे।

आगे चल के उनकर भीतर ई भावना मजबूत होत गइल कि भारत के राजनीतिक स्वतंत्रता खाली शासन बदले के सवाल ना ह, बल्कि भारतीय जनता के अपना भविष्य के फैसला खुद करे के अधिकार भी ह।

भगत सिंह के क्रांतिकारी चेतना अचानक पैदा ना भइल।

एह के पीछे परिवार, पंजाब के वातावरण, राष्ट्रीय आंदोलन, जलियाँवाला बाग जइसन घटना आ सबसे बढ़कर उनका अपना अध्ययन के योगदान रहे।


असहयोग आंदोलन आ ओकर बाद

1920-22 के असहयोग आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के एगो बहुत बड़ा जनआंदोलन रहे।

महात्मा गांधी के नेतृत्व में लाखों भारतीय ब्रिटिश शासन के खिलाफ असहयोग के रास्ता अपनवलें। नौजवान भगत सिंह भी ओ समय के राजनीतिक हलचल से प्रभावित भइलें।

बाकिर चौरी-चौरा के घटना के बाद असहयोग आंदोलन वापस लिहला पर देश के कुछ नौजवानन के सामने ई सवाल खड़ा भइल कि अब आजादी हासिल करे के रास्ता का होई।

भगत सिंह धीरे-धीरे क्रांतिकारी राजनीति के ओर बढ़े लगलें।

बाकिर उनकर यात्रा खाली भावनात्मक प्रतिक्रिया ना रहे।

समय बीते के साथ ऊ क्रांति के अर्थ के भी नया ढंग से समझे लगलें।


भगत सिंह: खाली क्रांतिकारी ना, एगो गंभीर विद्यार्थी

भगत सिंह के व्यक्तित्व के सबसे महत्वपूर्ण विशेषता में से एगो रहे—उनकर पढ़े के आदत।

ऊ इतिहास, राजनीति, अर्थशास्त्र, समाजवाद, दर्शन आ साहित्य पढ़त रहलें।

भारत सरकार के अभिलेखीय विवरण के अनुसार, जेल में रहला के दौरान भी ऊ किताब मँगवावत रहलें। उनकर जेल नोटबुक में अलग-अलग लेखक आ विचारकन के विचार आ उद्धरण दर्ज मिलेला।

ई तथ्य भगत सिंह के समझे खातिर बहुत महत्वपूर्ण बा।

ऊ खाली ई सवाल ना पूछत रहलें—

“अंग्रेजन के भारत से कइसे निकालल जाव?”

बल्कि ऊ एह से आगे के सवाल पूछत रहलें—

“आजाद भारत कइसन होखे के चाहीं?”

एह सवाल के कारण ऊ खाली क्रांतिकारी ना रह गइलें, बल्कि एगो राजनीतिक विचारक के रूप में भी सामने अइलें।


पत्रकार आ लेखक के रूप में भगत सिंह

भगत सिंह पत्रकारिता आ लेखन के राजनीतिक जागरण के माध्यम के रूप में इस्तेमाल कइलें।

ऊ कानपुर में पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी के संपर्क में अइलें आ प्रताप जइसन प्रकाशन से जुड़लें।

ऊ अलग-अलग पत्र-पत्रिका खातिर लेख लिखलें आ कई बेर छद्म नाम के इस्तेमाल कइलें।

मतवाला में ऊ ‘बलवंत’ नाम से लिखलें आ कीर्ति पत्रिका के संपादकीय गतिविधि से भी जुड़लें।

उनकर उद्देश्य खाली आपन विचार बतावल ना रहे।

ऊ चाहत रहलें कि—

  • नौजवान इतिहास पढ़स;

  • जनता राजनीतिक सवाल के समझे;

  • किसान आ मजदूर अपना अधिकार के प्रति जागरूक होखे;

  • समाज में सांप्रदायिक विभाजन कम होखे;

  • आजादी के अर्थ खाली सत्ता बदलला तक सीमित ना रहे।

एह दृष्टि से देखल जाव त भगत सिंह के लेखन उनकर क्रांतिकारी जीवन के ओतने महत्वपूर्ण हिस्सा रहे, जेतना उनकर राजनीतिक संघर्ष।


नौजवान भारत सभा आ नौजवानन के भूमिका

भगत सिंह आ उनका साथी लोग नौजवानन में राजनीतिक चेतना पैदा करे खातिर नौजवान भारत सभा (Naujawan Bharat Sabha) जइसन गतिविधि से जुड़ल रहलें।

युवा लोग के राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ल, सामाजिक चेतना पैदा कइल आ सांप्रदायिक एकता के बढ़ावा देल एह गतिविधियन के महत्वपूर्ण उद्देश्य में रहे।

भगत सिंह के विचारन के ई पक्ष बहुत महत्वपूर्ण बा।

उनका खातिर स्वतंत्रता खाली विदेशी शासन से मुक्ति ना रहे।

ऊ सामाजिक आ आर्थिक असमानता के सवाल के भी स्वतंत्रता के व्यापक अर्थ से जोड़त रहलें।


हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन

1928 में क्रांतिकारी संगठन के पुनर्गठन के दौरान हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के गठन भइल।

भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुखदेव, राजगुरु आ अउरी क्रांतिकारी एह धारा से जुड़ल रहलें।

संगठन के नाम में ‘सोशलिस्ट’ शब्द के जुड़ल एगो महत्वपूर्ण बात रहे।

एह से पता चलेला कि क्रांतिकारी आंदोलन के कुछ नौजवान भारत के आजादी के साथ सामाजिक आ आर्थिक समानता के सवाल पर भी विचार करत रहलें।

उनका खातिर क्रांति के मतलब खाली ब्रिटिश सत्ता के हटावल ना रहे।

क्रांति के मतलब रहे—

अन्याय पर आधारित व्यवस्था में बुनियादी बदलाव।


लाला लाजपत राय आ साइमन कमीशन

1928 में साइमन कमीशन के विरोध में लाहौर में प्रदर्शन भइल। एह प्रदर्शन के नेतृत्व लाला लाजपत राय करत रहलें।

प्रदर्शन के दौरान पुलिस लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय घायल भइलें आ बाद में उनकर निधन हो गइल।

भगत सिंह आ उनका साथी लोग एह घटना के ब्रिटिश शासन के दमनकारी नीति के प्रतीक के रूप में देखल।

एह के बाद पुलिस अधिकारी जे. पी. सॉन्डर्स के हत्या के घटना भइल।

एह घटना के एगो महत्वपूर्ण तथ्य ई बा कि क्रांतिकारी लोग के निशाना पुलिस अधिकारी जेम्स ए. स्कॉट रहे, जेकरा के ऊ लाठीचार्ज खातिर जिम्मेदार मानत रहलें; बाकिर पहचान के गलती से सॉन्डर्स के हत्या हो गइल।

ई घटना आगे चल के लाहौर षड्यंत्र केस के महत्वपूर्ण आधार बनल।


केंद्रीय विधानसभा बम प्रकरण

8 अप्रैल 1929 के भगत सिंह आ बटुकेश्वर दत्त दिल्ली के केंद्रीय विधानसभा में बम फेंकलें।

एह घटना के समझे समय एगो जरूरी बात ध्यान में रखल जरूरी बा।

एह कार्रवाई के उद्देश्य व्यापक जनहानि पैदा कइल ना बतावल गइल। घटना के बाद भगत सिंह आ बटुकेश्वर दत्त भागे के बजाय गिरफ्तारी दे दिहलें।

उनकर उद्देश्य आपन राजनीतिक संदेश जनता आ सत्ता तक पहुँचावल रहे।

बाद में अदालत के प्रक्रिया के इस्तेमाल भी ऊ आपन विचार जनता के सामने रखे खातिर कइलें।

एह से विधानसभा बम प्रकरण के खाली “बम फेंके के घटना” के रूप में देखल अधूरा होई।

ई औपनिवेशिक शासन के खिलाफ एगो राजनीतिक प्रदर्शन भी रहे।

साथ ही इतिहास के पूरा संदर्भ समझे खातिर ई तथ्य भी स्वीकार करे के चाहीं कि एह कार्रवाई में विस्फोटक के इस्तेमाल भइल रहे आ क्रांतिकारी हिंसा स्वतंत्रता आंदोलन के एगो विवादित धारा रहे।


गिरफ्तारी देवे के फैसला

एह घटना के बाद भगत सिंह आ बटुकेश्वर दत्त भाग सकत रहलें।

बाकिर ऊ लोग गिरफ्तारी दिहल।

काहे?

काहे कि अदालत के मंच के राजनीतिक विचार जनता तक पहुँचावे के माध्यम बनावल जा सके।

अर्थात—

जे सत्ता उनकरा के अपराधी साबित करे चाहत रहे, ओही सत्ता के न्यायिक प्रक्रिया के ऊ अपना विचार व्यक्त करे के मंच में बदल देलें।

एह घटना में भगत सिंह के राजनीतिक रणनीति आ विचार के बीच के संबंध दिखाई देला।


जेल में भूख हड़ताल

जेल में भगत सिंह आ उनका साथी लोग राजनीतिक बंदियन के साथ होखे वाला व्यवहार के खिलाफ भूख हड़ताल कइलें।

उनकर माँग में राजनीतिक बंदियन खातिर बेहतर भोजन, कपड़ा, किताब, लेखन सामग्री आ समाचारपत्र जइसन सुविधाएँ शामिल रहल।

ई घटना भगत सिंह के व्यक्तित्व के एगो अउरी महत्वपूर्ण पक्ष सामने ले आवेला।

जेल में भी ऊ पढ़े चाहत रहलें।

आज जे भगत सिंह के तस्वीर अक्सर पिस्तौल आ क्रांतिकारी प्रतीकन के साथ देखल जाला, उनकर जेल जीवन के एगो बड़ा हिस्सा किताब, लेखन आ विचार के अधिकार से जुड़ल रहे।


जतिन दास आ भूख हड़ताल

एह भूख हड़ताल से जुड़ल सबसे मार्मिक घटना में से एगो रहे जतिन दास के बलिदान।

जतिन दास राजनीतिक बंदियन के अधिकार खातिर लंबा भूख हड़ताल कइलें आ 13 सितंबर 1929 के 63 दिन के उपवास के बाद उनकर निधन हो गइल।

उनकर मृत्यु से पूरा देश में गहरी प्रतिक्रिया पैदा भइल।

ई घटना देखवलस कि स्वतंत्रता संघर्ष खाली सड़क आ मैदान में ना हो रहल रहे।

जेल के चारदीवारी के भीतर भी राजनीतिक प्रतिरोध चल रहल रहे।


“इंकलाब जिंदाबाद” के अर्थ

भगत सिंह के नाम के साथ सबसे प्रसिद्ध नारन में से एगो ह—

“इंकलाब जिंदाबाद।”

बाकिर ‘इंकलाब’ के खाली हिंसा के पर्याय मानल भगत सिंह के विचार के सीमित कर देला।

उनका खातिर क्रांति के एगो महत्वपूर्ण अर्थ रहे—

अन्यायपूर्ण व्यवस्था में बुनियादी परिवर्तन।

क्रांति के मतलब केवल सत्ता के बदलल ना, बल्कि समाज में सोच, व्यवस्था आ संबंधन में बदलाव भी रहे।

एह दृष्टि से—

इंकलाब बाहर के व्यवस्था बदले से पहिले विचार के दुनिया में शुरू हो सकेला।


“मैं नास्तिक क्यों हूँ?”

भगत सिंह के सबसे प्रसिद्ध लेखन में से एगो ह—

“मैं नास्तिक क्यों हूँ?” (Why I Am an Atheist)

ई लेख खाली धर्म के पक्ष या विरोध में सामान्य तर्क ना ह।

ई उनका व्यक्तिगत बौद्धिक विकास, आत्मचिंतन आ ईश्वर संबंधी प्रश्नन पर विचार के दस्तावेज ह।

एह लेख में ऊ अपना विचार, अनुभव आ विश्वास के बारे में तर्क प्रस्तुत करत रहलें।

भगत सिंह के नास्तिकता के उनका व्यक्तिगत बौद्धिक स्थिति के रूप में समझल अधिक उचित बा।

एकरा के कवनो धर्म या धार्मिक समुदाय के खिलाफ सामान्य बयान के रूप में देखल ठीक ना होई।

उनका विचार में तर्क, आत्मचिंतन आ मानव-केंद्रित दृष्टिकोण महत्वपूर्ण रहे।


भगत सिंह आ समाजवाद

भगत सिंह के राजनीतिक विचार समय के साथ विकसित भइल।

उनकर अध्ययन में समाजवाद, मजदूर आंदोलन, आर्थिक असमानता आ अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी विचार से जुड़ल साहित्य शामिल रहे।

उनकर जेल नोटबुक में दुनिया के अलग-अलग विचारकन के संदर्भ मिलेला।

एह से पता चलेला कि ऊ स्वतंत्रता के खाली राजनीतिक सत्ता के हस्तांतरण के रूप में ना देखत रहलें।

उनका सामने एगो बड़ा सवाल रहे—

अगर अंग्रेज भारत से चल भी जइहें, बाकिर समाज में शोषण, असमानता आ अन्याय बनल रही त का आजादी पूरा कहल जाई?

ई सवाल उनका समाजवादी चिंतन के एगो महत्वपूर्ण आधार रहे।


जेल के कोठरी में भी चलत रहल अध्ययन

भगत सिंह के जेल नोटबुक उनका बौद्धिक व्यक्तित्व के समझे के सबसे महत्वपूर्ण स्रोत में से एगो ह।

भारत सरकार के अभिलेखीय विवरण के अनुसार, एह नोटबुक में दर्शन, राजनीति, इतिहास आ साहित्य से जुड़ल अनेक विचार आ उद्धरण दर्ज रहे।

एह से आज के नौजवान खातिर एगो बहुत महत्वपूर्ण संदेश निकलता—

क्रांति से पहिले विचार चाहीं।

आ विचार खातिर—

अध्ययन चाहीं।

भगत सिंह के जीवन बतावेला कि साहस आ ज्ञान एक-दूसरा के विरोधी ना ह।

गंभीर अध्ययन से पैदा भइल विचार भी साहस के एगो रूप हो सकेला।


मुकदमा आ मृत्यु-दंड

भगत सिंह, सुखदेव आ राजगुरु के लाहौर षड्यंत्र केस में मृत्यु-दंड सुनावल गइल।

23 मार्च 1931 के लाहौर जेल में तीनों के फाँसी दे दीहल गइल।

आज 23 मार्च के भारत में व्यापक रूप से शहीद दिवस के रूप में याद कइल जाला।

ओ समय भगत सिंह के उमिर मात्र 23 वर्ष के आसपास रहे।

एतना कम उमिर में उनकर राजनीतिक आ बौद्धिक प्रभाव भारतीय इतिहास में एगो असाधारण घटना बन गइल।


भगत सिंह के सबसे बड़ी विरासत का ह?

अगर भगत सिंह के खाली एगो तस्वीर, एगो टोपी या एगो नारा तक सीमित कर दीहल जाव, त उनकर विरासत अधूरा रह जाई।

उनकर विरासत में कई महत्वपूर्ण आयाम दिखाई देला।

1. निर्भीकता

अन्यायपूर्ण सत्ता के सामने डर के पीछे ना हटल।

2. अध्ययन

राजनीतिक संघर्ष के समझे खातिर लगातार पढ़ल आ सीखल।

3. तर्कशीलता

कवनो विचार के खाली परंपरा के कारण स्वीकार ना कइल।

4. सामाजिक समानता

स्वतंत्रता के सामाजिक आ आर्थिक न्याय से जोड़ल।

5. नौजवानन के जिम्मेदारी

युवावस्था के खाली भावुकता ना, बल्कि ज्ञान, अनुशासन आ सामाजिक चेतना से जोड़ल।


आज के भारत में भगत सिंह के कइसे याद करीं?

हर साल 28 सितंबर के हमनी भगत सिंह के तस्वीर लगाईं।

उनकर नाम के नारा लगाईं।

उनकर शहादत के याद करीं।

बाकिर शायद उनका के याद करे के एगो अउरी तरीका हो सकेला।

हम अपने से कुछ सवाल पूछीं—

का हम पढ़त बानी?

का हम सवाल पूछत बानी?

का हम कवनो बात के खाली एहसे मान लेत बानी कि बहुते लोग ओकरा के मानेला?

का हम असहमति के सुन सकेनी?

का हम समाज के कमजोर आदमी के अधिकार के भी अपना अधिकार जेतना महत्वपूर्ण मानत बानी?

का देशभक्ति हमरा खातिर खाली नारा ह, कि जिम्मेदारी भी?

ई सवालन में भगत सिंह के विरासत आजो जिंदा रह सकेला।


भगत सिंह आ आज के नौजवान

आज के नौजवान ओह भारत में रहत बा जेकर स्वतंत्रता खातिर भगत सिंह आ उनका साथी लोग संघर्ष कइलें।

आज के समस्या अलग बा।

तकनीक बदल गइल।

अर्थव्यवस्था बदल गइल।

शिक्षा के तरीका बदल गइल।

सूचना के साधन बदल गइल।

बाकिर कुछ मूल सवाल आजो महत्वपूर्ण बा—

  • सही आ गलत सूचना में अंतर कइसे करीं?

  • सोशल मीडिया के दौर में विश्वसनीय ज्ञान कइसे पाईं?

  • सामाजिक असमानता के कइसे कम कइल जाव?

  • नौजवानन खातिर रोजगार आ अवसर कइसे बढ़ावल जाव?

  • लोकतांत्रिक संस्थानन के कइसे मजबूत कइल जाव?

  • असहमति आ संवाद के संस्कृति कइसे बचावल जाव?

  • देशभक्ति के जिम्मेदार नागरिकता से कइसे जोड़ल जाव?

आज के सवालन के सीधा जवाब भगत सिंह के समय से ना मिल सकेला, काहे कि परिस्थिति बदल गइल बा।

बाकिर पढ़े, सोचे, सवाल करे आ समाज के प्रति जिम्मेदारी महसूस करे के उनका आदत आजो प्रासंगिक बा।


भगत सिंह के खाली “शहीद” कहके भुला गइल ठीक ना होई

भगत सिंह भारत के महान शहीदन में श्रद्धा से याद कइल जालें।

बाकिर उनकर व्यक्तित्व के समझे खातिर खाली शहादत तक रुकल पर्याप्त ना ह।

ऊ पढ़त रहलें।

लिखत रहलें।

बहस करत रहलें।

राजनीतिक संगठन से जुड़त रहलें।

सामाजिक सवाल पर विचार करत रहलें।

अपना विचारन के लगातार विकसित करत रहलें।

आ जेल में भी अध्ययन जारी रखलें।

एहसे भगत सिंह के समझे खातिर उनकर तस्वीर से आगे बढ़ के उनकर लेख, पत्र, जेल नोटबुक आ राजनीतिक विचार के पढ़ल जरूरी बा।


शहादत के अर्थ

शहादत खाली मृत्यु के नाम ना ह।

शहादत तब अर्थपूर्ण बनेला जब ओकर पीछे कवनो विचार, उद्देश्य आ सार्वजनिक हित के भावना होखे।

भगत सिंह के जीवन एह कारण से भारतीय इतिहास में स्थायी स्थान रखेला।

ऊ अपना जीवन के स्वतंत्रता संघर्ष खातिर समर्पित कइलें आ अंतिम समय तक अपना विचारन के प्रति प्रतिबद्ध रहलें।

उनकर जीवन ई भी बतावेला कि राष्ट्र के निर्माण खाली महान नेता लोग से ना होला।

राष्ट्र के निर्माण ओह नौजवानन से भी होला जे—

सोचेला, पढ़ेला, सवाल पूछेला, जिम्मेदारी लेला आ अपना समय के समस्या से आँख ना चुरावेला।


भगत सिंह के स्मृति काहे अमर बा?

काहे कि ऊ खाली इतिहास के एगो तारीख ना हवन।

ऊ एगो सवाल हवन।

एगो चुनौती हवन।

एगो विचार हवन।

एगो बेचैनी हवन।

एगो अइसन युवा चेतना के प्रतीक हवन, जे अन्याय के सामान्य मान के स्वीकार करे से इंकार करेला।

एही कारण से 1931 में उनकर जीवन समाप्त हो गइल, बाकिर उनकर विचारन के प्रभाव समाप्त ना भइल।

उनकर जेल लेखन आ नोटबुक ई देखावेला कि भगत सिंह के पहचान खाली एगो क्रांतिकारी कार्रवाई तक सीमित ना रहे।

ऊ एगो गंभीर पाठक, लेखक आ राजनीतिक विचारक भी रहलें।


निष्कर्ष: भगत सिंह के पढ़ीं, खाली याद मत करीं

28 सितंबर के भगत सिंह के जयंती मनावल खाली श्रद्धांजलि देवे के अवसर ना ह।

ई अपने भीतर एगो सवाल उठावे के दिन भी ह—

हमनी के जे आजाद भारत मिलल बा, ओकरा के अउरी बेहतर बनावे खातिर हमनी के आपन जिम्मेदारी का बा?

भगत सिंह अपना समय के सवाल से मुँह ना मोड़लें।

ऊ पढ़लें।

सोचलें।

बहस कइलें।

लिखलें।

संघर्ष कइलें।

जेल गइलें।

आ अंत में अपना जीवन के बलिदान दे दिहलें।

आज उनका जीवन से सबसे बड़ा संदेश शायद ई बा—

देशभक्ति खाली भावना या नारा ना ह; ई ज्ञान, जिम्मेदारी, साहस आ समाज के प्रति संवेदनशीलता के नाम भी ह।

भगत सिंह के शहादत के सच्चा सम्मान खाली उनका तस्वीर पर फूल चढ़ावल ना ह।

उनकर अध्ययनशीलता, तर्कशीलता, सामाजिक चेतना आ देश के प्रति जिम्मेदारी के समझल आ अपना जीवन में ओकरा से सीख लेवे के कोशिश कइल भी उनका के सच्ची श्रद्धांजलि हो सकेला।

शहीद-ए-आज़म भगत सिंह के विनम्र नमन।

Research & Content: G. D. Pandey
Knowledge Hub – Information Center


भगत सिंह: जरूरी तथ्य

नाम: भगत सिंह
जन्म: 28 सितंबर 1907
जन्मस्थान: बंगा, लायलपुर जिला, अविभाजित पंजाब
पिता: किशन सिंह
माता: विद्यावती
प्रमुख संगठन/गतिविधि: नौजवान भारत सभा, हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन आ क्रांतिकारी गतिविधियाँ
प्रमुख साथी: सुखदेव, राजगुरु, चंद्रशेखर आजाद, बटुकेश्वर दत्त आदि
प्रमुख घटना: सॉन्डर्स हत्या प्रकरण, केंद्रीय विधानसभा बम प्रकरण, जेल भूख हड़ताल, लाहौर षड्यंत्र केस
प्रसिद्ध लेख: “मैं नास्तिक क्यों हूँ?”, “युवा राजनीतिक कार्यकर्ताओं के नाम पत्र” आदि
शहादत: 23 मार्च 1931, लाहौर जेल
उमिर: लगभग 23 साल


आज के नौजवान खातिर भगत सिंह के पाँच संदेश

पढ़ीं।

सिर्फ सोशल मीडिया पोस्ट ना, मूल किताब आ दस्तावेज भी पढ़ीं।

सोचीं।

हर बात के बिना जाँच के स्वीकार मत करीं।

सवाल करीं।

सवाल ज्ञान के शुरुआत ह।

अन्याय के प्रति संवेदनशील रहीं।

समाज के कमजोर आदमी के अधिकार के महत्व समझीं।

देश के प्रति जिम्मेदारी निभाईं।

देशभक्ति के मतलब खाली अधिकार ना, जिम्मेदारी भी ह।

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भगत सिंह: विचार, संघर्ष आ शहादत - एगो अइसन जीवन जे आजो सवाल पूछेला

28 सितंबर — शहीद-ए-आज़म भगत सिंह जयंती भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास खाली लड़ाई, आंदोलन आ राजनीतिक समझौता के इतिहास ना ह। ई ओह अनगिनत...